सपने में पिया पानी’ – एक भले इंसान की समर्थ कविताएं

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कवि-मित्र समर्थ वशिष्ठ का कविता-संग्रह ‘सपने में पिया पानी’ सामने है। किताब के साथ समर्थ के हाथ से लिखी सात फरवरी 2017 की एक चिट्ठी है जो रफ पेपर पर लिखी गई है – ‘प्रिय निखिल, किताब की तुम्हारी कॉपी भेज रहा हूं। इस पर आलोचनात्मक कुछ लिखने का मन बना सको तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी। सोचना। कागज़ की दूसरी तरफ से पत्र लिखने की धृष्टता के लिए क्षमाप्रार्थी हूं। सोचा कुछ पेड़ बचाए जाएं।‘

समर्थ की कविताओं पर बात करने के लिए इस ख़त का ज़िक्र ज़रूरी था। मित्र हैं, सीधा फोन करके कहते कि कुछ लिखो मेरे लिए। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। सकुचाते हुए मेरे सोचने पर छोड़ दिया। ऐसे ही हैं समर्थ। भीतर-भीतर रहने वाले। इस तरह का आग्रह एक अच्छे कवि के साथ अच्छे इंसान होने की भी निशानी होती है। मुझे अच्छे कवियों से ज़्यादा अच्छे इंसानों को पढ़ने में ज़्यादा दिलचस्पी रही है। जैसे समर्थ।

समर्थ की सबसे छोटी कविता पांच शब्दों की है, जिसका शीर्षक छह शब्दों का है –‘एक आवारा कुत्ते का समाधि-लेख’।
‘जब तक जिया
गंधाया नहीं।‘
एक कवि के तौर पर मैं ऐसी कविताओं को कविताएं नहीं मानता। फेसबुक के ज़माने में हम सब ब्रह्रवाक्यों के आविष्कारक हैं। इसके लिए कवि होना या न होना ज़रूरी नहीं। अब एक लंबी कविता का टुकड़ा पढ़ता हूं –
‘अलस्सुबह
मोबाइल पर बात करता एक शहर
कहां हो रही हैं इतनी बातें
कौन कर रहा है इतनी बातें
मैं क्यूं नहीं हूं इनके बीच?’ (कविता – ‘दिल्ली’)
ये कविता कहने की समर्थ की शैली है। शहर का परिचय देते-देते कवि अपना परिचय देने लगता है। राजधानी जैसे शहर में हिंदी के एक कवि की हैसियत क्या है। वो क्यूं नहीं है तमाम संवादों यानी तिकड़मों, कानाफूसियों, पुरस्कारों के बीच। हल्के-से अपना सवाल रखकर कविता ख़त्म कर देता है। दिल्ली के पास इसका कोई जवाब नहीं।

‘सपने में पिया पानी’ एक भले, संकोची इंसान की डायरी जैसा संग्रह है। जिसमें वो थोड़ा मुखर दिखते हैं, एकदम सहज और स्वाभाविक। शायद अपनी बेटी को एक शानदार कविता ‘पराजय’ के ज़रिए समर्थ अपने ‘अच्छे’ होने की विरासत सौंपते हैं –
‘मैं तुम्हें हारना सिखाऊंगा
जैसे मैं तुम्हें सिखना चाहता हूं
जीतना
जीतो तुम शायद सिर्फ एक बार
हारोगी सौ बार
खेदपत्र, निपट अकेली चुप्पियां
साथ चलेंगी तुम्हारे भी
मैं सिखाना चाहता हूं तुम्हें
कि चुननी पड़ती है कई बार हार’(कविता – ‘पराजय’)
ये मेरी सबसे पसंदीदा कविता है। इतना ओरिजिनल होने के लिए जो जीवन जीना पड़ता है, वही अनुभव एक भले इंसान के गंभीर कवि बनने का ट्रांज़िशन है। हम सब कवि जैसे लोग दुनिया को थोड़ा-बहुत विनम्र इन्हीं पलों में बना सकते हैं। अफसोस, मेरे पास ऐसी कविताएं कम हैं।

समर्थ की कविताओं में जल्दबाज़ी कहीं नहीं है। एक ठहराव है-जो बनावटी नहीं है। एक अनगढ़ता भी है, जो भीतर तक उतरती है –
‘एक स्त्री का तुम्हें
तुम्हारे तिलों और मुहांसों समेत
जानने का आनंद
तुम्हारा एक स्त्री को जानना
अपनी टांग की ढीठ दाद से बेहतर।‘ (कविता – ‘एक प्रेमगीत’)
पहले कविता-संग्रह में कई हल्की कविताएं भी हैं, जिन्हें नहीं होना चाहिए था। कुछ ग़ज़लें भी हैं, जिनके बिना भी कविता-संग्रह चल सकता था। एक प्यारा-सा नवगीत भी है –
‘खाली हो टंकी जब सूखे हों नल
शॉवर में रहता है थोड़ा-सा जल
ऐसे ही जाता है जीवन निकल।
चिल्लाती सुबहों में फैले उजास
जागूं मैं ज्यूं ही इक कविता उदास
जम्हाई लेती-सी आ बैठे पास।’

समर्थ अपने नाम के बराबर ही समर्थ कवि हैं। कविताएं उनके पास यार-दोस्त की तरह जम्हाई लेती बैठी रहती हैं। उनकी कविताओं में भीतर का मंथन ज़्यादा है, जो नया और अच्छा लगता है। आजकल बाहर-बाहर लिखने वाले यूं भी बहुत हैं हिंदी कविताओं में। इस तरह अपने दोस्त समर्थ की सारी कविताएं पढ़वायी जा सकती हैं, मगर कुछ भीतर-भीतर बचा लेता हूं, अपने लिए। बधाई।

निखिल आनंद गिरि

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